Saturday, April 4, 2009

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा .............


कल तन्हा सी रात

मै मैंने देखा....

इक तन्हा से तारे को ,

खुले गगन मे था वो तन्हा ,

कल अंधियारी रात मे !

देखकर उसको ऐसा लगा ,

जैसे खड़ी हूँ मै अकेली ,

इस तन्हा से जहान मे ,

पाने को अस्तित्व अपना !

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा ..............

अपने मन को झाकते से अपने अंतर्मन की गहराई मे ,

कितना तन्हा है ,

वो इस बड़ी सी दुनिया में !

भागते उसको मैंने रोका ,

इस दुनिया की भीड़ मे !

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा ...............

मेरे अपनों को अपनों की ,

इस भीड़ मे ,

थे वो मुझ से दूर कभी ,

है वो सब से पास अभी !

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा .............

इक नन्ही सी ज्योत को ,

जो जलती है औरों की खातिर ,

अंधियारे को दूर करने ,

और खुद रहती है ,

इक किरण की आस मे !

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा ................

उसको तन्हा ,

जो करती है दूर सदा औरों की तन्हाई को ,

सगे - सम्बन्दी बन कर उनकी ,

जिन का कोई नहीं , इस बड़ी सी दुनिया मे ,

कल तन्हा सी रात मै मैंने देखा .............

उसको तन्हा ?????

1 comment:

deepak said...

hi manju...very good profile ..nice to see u.
here iam pradeep k k ..working for delhi internationl airport as a executive engineer in Terminal 3...